सांगानेर में किसके गले होगा 'हार'...किसे मिलेगी हार?

जस्ट टुडे की ग्राउण्ड रिपोर्ट


निकाय चुनाव 2020 : सांगानेर के 10 वार्डों का जस्ट टुडे ने लिया जायजा, बागियों ने कठिन की भाजपा-कांग्रेस की राह, भितरघात से बदल सकते हैं चुनावी समीकरण



जस्ट टुडे
जयपुर। निकाय चुनावों का बिगुल बज चुका है। प्रत्याशियों को सिम्बल भी मिल चुके हैं। ऐसे में अब प्रत्याशियों ने चुनावी प्रचार में अपनी ताकत झोंक दी है। कोरोना के चलते प्रत्याशी घर-घर जाकर भी प्रचार करने में जुटे हैं। ऐसे में कोई भी प्रत्याशी जनता के मूड को नहीं समझ पाया है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में ही है। हालांकि, दोनों पार्टियों के कई बागी उम्मीदवारों के भी चुनावी मैदान में होने से कई जगह मुकाबला त्रिकोणीय होने के भी आसार हैं। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा दोनों नेता चुनाव में अपनी-अपनी पार्टी के जीत के दावे कर रहे हैं। चुनावी मौसम में जस्ट टुडे ने सांगानेर के 10 वार्डों का जायजा लिया। 10 वार्डों में प्रत्याशियों की क्या है जमीनी हकीकत? क्या इस चुनाव में भी पार्टियों की भूमिका पहले की तरह अहम है? क्या निर्दलीय प्रत्याशी चुनावी समीकरण को बदलने का माद्दा रखते हैं? जनता के सारे सवालों के जवाब खोजती जस्ट टुडे की ग्राउण्ड रिपोर्ट।  


तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं निर्दलीय



सांगानेर को यूं तो भाजपा का गढ़ माना जाता है। लेकिन, निकाय चुनाव में हमेशा से स्थिति एक जैसी नहीं रही है। इस बार कोराना का कहर तो है ही, साथ ही वार्डों की सीमा भी सीमित होने से किसी भी पार्टी का अब एकछत्र राज नहीं रह गया है। छोटे-छोटे वार्ड होने से अब पार्टियों के बजाय प्रत्याशी का किरदार भी बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। सांगानेर के सभी 10 वार्डों में कमोबेश एक जैसी स्थिति है। दोनों ही पार्टियां अपनी-अपनी जीत के दावे तो कर रही हैं, लेकिन, आश्वस्त कोई भी नहीं हैं। कई जगह तो प्रत्याशी भाग्य भरोसे बैठे हैं। हालांकि, दोनों ही पार्टियों के बागी उम्मीदवारों ने भी ताल ठोक रखी है। उनका कहना है कि भले ही वे ना जीतें, लेकिन, अपनी पार्टी के प्रतिद्वंदी को भी वे जीतने नहीं देंगे। कई वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों का दबदबा होने से भी मुकाबला त्रिकोणीय बनता दिख रहा है। ऐसे में कई वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशी तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं। 


बागियों ने बढ़ाई पार्टियों की मुश्किल



भाजपा और कांग्रेस दोनों में ही बागी उम्मीदवार हैं। कई उम्मीदवार तो चुनाव में उतर चुके हैं। कई चुनाव में तो नहीं उतरे, लेकिन, अपने प्रतिद्वंदी को हराने के लिए चक्रव्यूह की रचना जरूर करने में लगे हैं। भाजपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के टिकट वितरण से कई समाज भी नाराज हो गए हैं। ऐसे में वे समाज किस प्रत्याशी को समर्थन करते हैं, उसका भी परिणाम  पर बहुत असर पड़ेगा। हालांकि, कई वार्डों में वर्चस्व के लिए समाजों में भी दो गुट बन गए हैं। एक गुट की पसंद कोई प्रत्याशी है तो दूसरे की पसंद दूसरा प्रत्याशी। ऐसे में समाज के वोट भी बंटते हुए दिख रहे हैं। किसी एक प्रत्याशी को समाज के पूरे वोट नहीं जा रहे हैं। 


पैराशूट प्रत्याशियों की राह कठिन


दोनों ही पार्टियों ने कई बाहरी प्रत्याशियों को भी टिकट दिया है। ऐसे में मतदाता पार्टी को तवज्जो देंगे या फिर स्थानीय को, यह अहम होगा। पैराशूट प्रत्याशियों को लगातार बागियों से चुनौती मिल रही है। क्योंकि, बागी व्यक्ति स्थानीय हैं। भले ही वह चुनाव नहीं लड़ रहा हो, लेकिन, पैराशूट उम्मीदवार को हराने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहा है। कई वार्डों में प्रत्याशी असमंजस में हैं कि जनता तक ज्यादा से ज्यादा कैसे पहुंचा जाए? क्योंकि, कोरोना की वजह से उनके पास जनता तक पहुंचने के साधन नाममात्र के रह गए हैं। 


दल बदलुओं से खफा है जनता


कई वार्डों में पार्टियों ने ऐसे प्रत्याशियों को टिकट दे दिए, जो पहले दूसरी पार्टी में थे। लेकिन, टिकट के लिए चुनाव से पहले दूसरी पार्टी का दामन थाम लिया था। ऐसे में स्थानीय लोगों में भी उनके प्रति आक्रोश है। लोगों का कहना है कि ऐसे लोग वफादार नहीं होते। क्योंकि, जो टिकट के लिए अपनी पार्टी को छोड़ सकता है, वह चुनाव जीतने के बाद जनता का दर्द क्या सुनेगा? 


जनता को नहीं पसंद, कम शिक्षित प्रत्याशी


कई जगह भाजपा-कांग्रेस ने ऐसे लोगों को टिकट दे दिया, जिनकी वार्ड में लोकप्रियता नहीं है। ऐसे प्रत्याशी वार्ड के जाने-पहचाने नाम नहीं है। ऐसे में सिर्फ पार्टी के बूते चुनावी बैतरणी पार करना, इनके लिए संभव नहीं दिख रहा है। कई जगह ऐसे प्रत्याशी खड़े हैं, जो ज्यादा शिक्षित नहीं है। ऐेसे में कम शिक्षा, पार्षद बनने की राह में रोडा डाल सकती है। क्योंकि, डिजिटल युग में कम शिक्षित पार्षद जनता की पसंद नहीं बन पाएगा।


कई प्रत्याशियों के पास नहीं है टीम


सांगानेर के 10 वार्डों में कई प्रत्याशियों के पास संगठित कार्यकर्ताओं की टीम नहीं है। ऐसे में उनका चुनाव प्रचार अभी तक जोर ही नहीं पकड़ पाया है। हालांकि, वे अपने गिने-चुने लोगों के साथ घर-घर जाकर प्रचार तो कर रहे हैं, लेकिन, कार्यकर्ताओं के अभाव में उन्हें जन समर्थन नहीं मिल पा रहा है। 
उनके रिश्तेदार और जान-पहचान वाले ही उनकी थोड़ी हवा बनाने में लगे हुए हैं। कई प्रत्याशी वार्ड के जाने-पहचाने नाम हैं, लेकिन, कार्यकर्ताओं के अभाव में वे सभी लोगों तक अपनी पहुंच नहीं बना पा रहे हैं। ऐसे में उन्हें जीतने के लिए एड़ी-चोट का जोर लगाना पड़ेगा। 


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