सरस्वती के संग्रामपुर से द्रव्यवती का सांगानेर



गेस्ट एडिटर
पुरूषोत्तम नागर, समाजसेवी

जस्ट टुडे

सांगानेर। आठवीं शताब्दी में सांगानेर संग्रामपुर के नाम से विख्यात था एवं नगर के समीप से 'सरस्वतीÓ नामक पावन सरिता बहती थी, जो नगर वासियों की अंजली में सुख, प्रगति, समृद्धि और गरिमाएं भरती रहती थीं। काल की गति देखिए वह पावन नदी आज गन्दे नाले (पहले अमानीशाह और अब द्रव्यवती नदी) के रूप में रह गई है।
बहते पानी, बाग-बगीचों की बहुतायत खेती बाड़ी और व्यापार धंधों की उन्नति से सम्पन्न सांगानेर के निवासी आरंभ से ही धर्म-कर्म के प्रति समर्पित रहे हैं। सांगानेर को दूर से देखें या पास से मठ, मन्दिरों के शिखर, गुम्बदें ही इस प्राचीन मध्यकालीन कस्बे की आकाश रेखा बनाते प्रतीत होते हैं। त्रिपोलिया से चोहट्टी तक का (राधा वल्लभ मार्ग) सांगानेर की देवालय वीधी है। जगदीश जी, कल्याण जी, चतुर्भुज जी, सांगा जी, कृष्ण चन्द्रमा जी जैसे प्राचीन मन्दिर इसी वीधी में है। कृष्ण चन्द्र जी का मन्दिर जयपुर के महाराजा प्रतापसिंह के समय (1778-1803 ई.) में सांगानेर के अमिल पण्डित अमर चन्द जोशी ने बनवाया था। इनके पूर्वज लवाण के निकट बंधापाटन से सांगानेर आ बसे थे। अमर चन्द जोशी से छठी पीढ़ी के स्व. सुन्दर लाल जोशी के वंशज आज भी मंदिर की सेवा-पूजा में कार्यरत हैं। 


ताने ने बुना कल्याणजी मंदिर का ताना-बाना

उस समय चोहट्टी के सिरे पर स्थित चतुर्भुज जी का मन्दिर वैष्णव मन्दिरों में प्राचीनतम है। इसकी कार्यरत निर्माण कला नौ चौकियों जगमोहन की आडे तिरछे पत्थरों से बनी नीची छत और स्तम्भ इसकी प्राचीनता के साक्षी हैं। मूल रूप से मन्दिर एक हजार वर्ष से अधिक प्राचीन होना प्रतीत होता है। यह मन्दिर माहेश्वरियों और खण्डेलवाल वैश्यों की पंचायतें हुआ करती थीं।  इनके पंचों एवं चौधरियों के बैठने के स्थान नियत थे। एक बार खण्डेलवालों का चौधरी, माहेश्वरियों के पंच से पहले ही उसके स्थान पर आकर बैठ गया और माहेश्वरियों ने उसे अपने स्थान पर बैठने को कहा तो उसने इनकार कर दिया। इस पर माहेश्वरियों ने ताना मारा कि ऐसा है तो अपना मन्दिर क्यों नहीं बनवा लेते? इसी ताने से खण्डेलवाल वैश्यी ने सामने ही अपना पंचायती कल्याणजी का शिखरान्त मन्दिर बनवाया। खण्डेलवालों में तब शिव वक्स लूसर नामक एक नव धनाढ्य व्यापारी प्रमुख थे। जिन्होंने ही राज राजेश्वर जी का मन्दिर और उसके समीप विशाल बाबड़ी बनवाई थी। मन्दिर का आधा भाग उत्तरी इन्हीं बूसर ने बनवाया, उत्तरी भाग में गर्भ गृह के बाहर मणि खम्भ है। जिस पर कांच जड़े हैं और मकराना लगा हुआ है, इस मन्दिर के दक्षिणी भाग में चौहट्टी को देखता झरोखा कलात्मक है। मन्दिर में राधाकृष्ण की प्रतिमाएं हैं, कल्याण या विष्णु की नहीं, इसके लिए कहा जाता है कि शिव वक्सवूसर के पुत्र का नाम कल्याण था और उसी के नाम पर ही मन्दिर का नामकरण 'कंवर कल्याण जी का मन्दिर किया गया।


भूंगड़े वाले बूसर से जूठ की बाबड़ी बनवाने का सफर

शिव वक्स वूसर के सम्बंध में सांगानेर का लोक ख्यान है कि वह एक कच्चे झोंपड़े में धाणी भूंगड़े-चना चबेना बेचा करता था और वहीं रहते हुए दो वक्त की रोटी एक ही वक्त में बनाकर रख लेता था। एक दिन महात्मा उधर से निकले और भोजन मांगा तो बूसर ने शाम के लिए रखी अपनी रोटियां उसे खिला दीं और खुद भूंगड़ खाकर सो गया। महात्मा दो दिन उसके पास रहे और जाते समय उसे कोई चमत्कारिक जड़ी दे गया, यह कहकर कि बाद में वापसी पर आकर ले लूंगा। बूसर ने उसे अपने छप्पर के बाते में रख दिया, दूसरे दिन बरसात आई तो उस जडी से टपके पानी की बूंद से लोहे का तवा सोने का बन गया और वह मालामाल हो गया। सांगानेर में तब कपास का व्यापार बहुत खूब होता था और बूसर ने इस व्यापार से खूब धन कमाया। इसी धन से राजराजेश्वर मन्दिर, बावडी (वर्तमान में सीटी बस स्टैण्ड) बनवाई तथा चतुर्भुज जी के मन्दिर के पास एक तिमंजली हवेली बनाकर उसमें रहने लगा। चोहट्टी में जगदीश या जगन्नाथ का मन्दिर बनवाने वाले जोगा जी जोशी को जगन्नाथ जी का ईष्ट था, यही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी पौत्री के विवाह में मोहरों की परोसगारी करा कर ऐसे आरण्यान की रचना कर दी जो आज तक कहा सुना जाता है 'जूठ की बावड़ी ' के निमित्त यही थे। 

सांग से निकला शिवलिंग और बसा सांगानेर

सांगानेर के अच्छे दिनों में सांगानेर को पांच नहरें (नदियां) घेरे रहती थीं। जिन्हें टोंक नहर, रजका नहर, सरस्वती नदी, राजबाग की नहर और मतवाली नहर कहा जाता था। कभी 108 मन्दिरों से मण्डित सांगानेर के बद्रीनाथ जी का मन्दिर (नामदेव चौक) उत्तराखण्ड के बद्रिकाश्रम के समान माना जाता था। जगदीश जी का मन्दिर जगन्नाथपुरी, केशवराम का मन्दिर (नामदेव मन्दिर) द्वारका और सांगेश्वर शिव का मन्दिर रामेश्वरम् के प्रतीक बने हुए थे, जो लम्बी तीर्थ यात्रा पर नहीं जा सकते थे, उनके लिए जैसे चारों धाम यहीं विद्यमान थे। नामदेव चौक के पूर्व में सांगेश्वर महादेव मन्दिर है। सांगानेर के नामकरण को इससे भी जोड़ा जाता है। किवदन्ती है कि जहां आज सांगानेर बसा है, वह कभी घना जंगल था और मन्दिर के पास एक तलाई थी। एक बार कुछ डाकू इधर से गुजरे तो तलाई के किनारे उन्होंने पडाव किया और कुछ धन गाडने के लिए अपने हथियार सांग से गड्ढ़ा खोदने लगे। इस प्रक्रिया में सांग पत्थर से टकराया तो टकराहट की आवाज हुई, इस पर सावधानी से उस स्थल को खोदा गया तो शिवलिंग प्रकट हुआ, सांग से प्रकट इस शिवलिंग को सांगानेर के नाम से स्थापित कर पूजा गया और इसके चारों ओर बसी बस्ती सांगानेर कहलाई। इस जनश्रुति के विपरीत सांगानेर को आमेर के राजा पृथ्वीराज के एक वीर पुत्र सांगा द्वारा बसाए जाने की बात भी प्रचलित है।


सांगानेर को सांगो बाबो, जयपुर को हनुमान।
आमेर की शिल्ला देवी, ल्याओ राजा मान।।
मथुरा में जन्म लीन्हो, गोकुल में क्रीडा कीन्ही।
पाय राशि सारे असुरों को मार डाला है।।
कंस को पछाड़ उगर सेन जी को राज दीन्हो।
योही श्री कृष्ण गोविन्द को सहारो है।।


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