लॉकडाउन में मीडिया कर्मियों की सैलेरी भी हुई डाउन

लॉकडाउन का बहाना बनाकर राजस्थान के कई मीडिया हाउसेज ने कर्मचारियों की सैलेरी 50 फीसदी तक काटी 


जस्ट टुडे
जयपुर। कोरोना वायरस से फिलहाल पूरा देश और विदेश लॉकडाउन है। ऐसे में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने कर्मचारियों से 'वर्क फ्रॉम होम' करा रही है। कर्मचारी भी 'वर्क फ्रॉम होमÓ से बेफ्रिक होकर कार्य कर रहे थे। उन्हें पता ही नहीं लगा कि इसके जरिए मीडिया हाउस अपने कर्मचारियों और उनकी सैलेरी में भारी कटौती कर देगी। इसका ताजा मामला जयपुर में ही आया है। यहां के सबसे पुराने प्रिंट मीडिया हाउस ने कोरोना वायरस की आड़ में अपने समस्त कर्मचारियों को एक फिक्स अमाउंट ही सैलेरी के नाम पर दिया है। कुछ ऐसा ही हाल सुबह प्रकाशित होने वाले एक अन्य अखबार का भी है, जिससे वर्क फ्रॉम होम का विकल्प देकर कर्मचारियों की सैलेरी आधी कर दी है। सैलेरी कम होने पर कर्मचारियों में भयंकर रोष है, लेकिन नौकरी जाने के भय से फिलहाल सभी ने चुप्पी साध रखी है। हालांकि, दबी जुबान से सभी कर्मचारी इसे अन्याय बता रहे हैं। 


मीडिया हाउस कम करेंगे कर्मचारी, सैलेरी भी करेंगे कम



राष्ट्रीय स्तर के दो अंग्रेजी समाचार-पत्रों में भी कर्मचारियों की सैलेरी 30 फीसदी काटने की बात सामने आ रही है। राजस्थान के दो न्यूज चैनल ने भी अपने कर्मचारियों की सैलेरी में 30 फीसदी की कटौती की है। विश्वसनीय सूत्रों से पता चला है कि राजस्थान से प्रकाशित होने वाले प्रमुख समाचार-पत्रों सहित देश के कई नामचीन प्रिंट मीडिया हाउस ने आगामी एक महीने में करीब 50 फीसदी कर्मचारियों को घर बिठाने पर मंथन शुरू कर दिया है। साथ ही ज्यादातर कर्मचारियों से 'वर्क फ्रॉम होमÓ करवाया जाएगा, फिर उनकी सैलेरी भी आधी कर दी जाएगी। इस अखबार ने अपने कर्मचारियों को मौखिक नोटिस भी दे दिया है। 


अपनी पूंछ पर पैर पड़ते ही लगे गिरियाने


सैलेरी काटने या कम देने के पीछे तमाम मीडिया हाउसेज का तर्क है कि कोरोना वायरस के चलते उनके विज्ञापनों में भारी कटौती हुई है, जिससे उनकी बैलेंस शीट गड़बड़ा गई है। चूंकि, ये तमाम मीडिया हाउसेज बड़े हैं, और अभी तक लॉकडाउन के 20 ही दिन हुए है, ऐसे में इनके विज्ञापनों में यदि कटौती हुई भी है तो भी ये नुकसान में नहीं है। क्योंकि, पिछली वसुंधरा राजे सरकार में राजस्थान के एक बड़े मीडिया हाउस की मुख्यमंत्री राजे से अनबन हो गई थी, जिसमें राजे ने उस मीडिया हाउस के विज्ञापन भी बंद कर दिए थे, तब तो वह मीडिया हाउस बंद नहीं हुआ। ऐसे में क्या 20 दिन या फिर दो-तीन महीने में ही मीडिया हाउस कंगाल हो जाएंगे। साथ ही इन मीडिया हाउसों में दिवाली, दशहरा, धनतेरस, होली पर विज्ञापनों से बहुत अधिक आय होती है, तब तो ये कर्मचारियों को डबल सैलेरी नहीं देते हैं। तो फिर यदि दो-तीन महीने विज्ञापन कम भी आ जाएं तो फिर ये उनकी सैलेरी क्यों काट रहे हैं। अभी कोरोना वायरस के चलते अखबारों में पन्ने कम कर दिए गए हैं, फिर भी कई समाचार-पत्रों ने कीमत कम नहीं की है। हालांकि, कोरोना वायरस में भी सरकार ने इनके विज्ञापनों में कोई कटौती नहीं की है। वहीं सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 2 साल तक मीडिया को विज्ञापन ना देने की नसीहत से राजस्थान के एक बड़े मीडिया हाउस के मालिक गिरियाने लग गए हैं। जबकि एक दिन पहले सांसदों के वेतन में 30 फीसदी की कटौती करने की उन्होंने पीएम मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। इसके कहते हैं कि दोहरा चरित्र। 


कोई भी कम्पनी ना तो कर्मचारी को हटा सकती है ना वेतन काट सकती है

राजस्थान सरकार ने लॉक डाउन में किसी भी कम्पनी को कर्मचारी को नहीं हटाने और वेतन नहीं काटने के साफ निर्देश दे रखे हैं। इसमें राजस्थान के सभी मीडिया हाउस भी शामिल हैं। श्रम विभाग ने राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर समेत सभी को पत्र लिखकर सरकार के निर्देश से अवगत भी करा रखा है, लेकिन इसके बावजूद राजस्थान के प्रमुख मीडिया हाउस ना केवल अपने कर्मचारियों, पत्रकारों को आधे से भी कम वेतन दे रहे हैं, बल्कि इन्हें नौकरी से भी निकाला जा रहा है। मात्र 21 दिन के लॉकडाउन में यह बहाना बनाया जा रहा है, लॉक डाउन से विज्ञापन नहीं मिल रहे हैं, जबकि सरकार बराबर विज्ञापन दे रही है। अखबार वालों ने पेज भी कम कर दिए है लेकिन रेट पहले जितनी ही है। मीडिया मालिक इसे बहाना करके गलत तरीके से कर्मचारियों, पत्रकारों को निकालने की साजिश रच रहे हैं। इस वजह से पहले वेतन कम दिया है और अब इन्हें निकालने की कार्यवाही की जाएगी। सतर्क हो जाओ। कोई भी कर्मचारी श्रम विभाग को पूरा वेतन नहीं देने की शिकायत कर सकते हैं। सरकार के आदेश की पालना ना होने पर दो साल की सजा के प्रावधान है।


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