दौसा गेट मिट कर हुआ सांगानेर अमिट

शहादत की कहानी: 1981 में बाढ़ के पानी से लोहा लेकर शहीद हुआ सांगानेर का प्रवेश द्वार

लेशिष जैन
जस्ट टुडे
सांगानेर। जयपुर से पहले स्थापित हुए सांगानेर में उत्कृष्ट नक्काशीदार मंदिर हैं तो ठप्पे व जालीदार छपाई की इकाइयों द्वारा हाथ से बने बढिय़ा कपड़े विदेशों तक मशहूर हैं। इसके साथ ही इसके चारों तरफ परकोटा हुआ करता था, जिसके अवशेष अभी भी कई जगह मौजूद हैं। उस परकोटे में पांच गेट थे। इनमें दौसा गेट को संागानेर का मुख्यद्वार माना जाता था। अन्य गेटों में जयपुर गेट, सांभर गेट, मालपुरा गेट और चाकसू गेट थे। सांभर गेट  वर्तमान में ध्वस्त हो चुका है। सांगानेर के पुराने निवासी बताते हैं कि वर्तमान में चौरडिय़ा पेट्रोल पम्प के पीछे वाले हिस्से में सांभर गेट हुआ करता था। सांगानेर एयरपोर्ट की जो चारदीवारी बनी हुई है, वह इसी गेट के पत्थरों की बनी है। इसे वर्ष 1944 में तोड़ दिया गया। जयपुर गेट, मालपुरा गेट और चाकसू गेट अभी वर्तमान में मौजूद हैं। इन सभी से अलग सांगानेर के मुख्य द्वार यानी दौसा गेट की कहानी दिलचस्प है। अगर दौसा गेट ना होता तो शायद वर्तमान में सांगानेर का अस्तित्व भी नहीं होता। आखिर क्या है दौसा गेट की शहादत की कहानी? कैसे बचाया इसने सांगानेर को? इतिहास के पन्नों से पलटकर जस्ट टुडे लाया है सिर्फ अपने खास पाठकों के लिए।



एक घंटे की टक्कर और पानी को होना पड़ा पानी-पानी


दौसा गेट यानी सांगानेर का प्रवेश द्वार।  करीब 40 फीट ऊंचा और 25 फीट चौड़ा दरवाजा हमेशा इसकी सुरक्षा को चाक-चौबंद रखता था। इस द्वार रूपी सुरक्षा प्रहरी के चलते सांगानेर की प्रजा सुख-चैन से रहती थी। कागज सहित अन्य कार्य इसी के पास बहने वाली नदियों के पास होते थे। इसी के पास स्थित कन्या पाठशाला में शिक्षा की अलख जलती थी। इस खुशनुमा जीवन के सफर में वर्ष 1981 में संभवत: 19 जुलाई की सुबह करीब 8:30 बजे बारिश का रूप लेकर खौफनाक मंजर आया।
    तेज बारिश से पहले तो रावलजी का बंधा और फिर खवासजी का बंधा टूटा। उसके बाद पानी सांगानेर स्थित कमानी फार्म के पास रेलवे ब्रिज के अंदर रूक गया और थोड़ी देर में तेज धमाका हुआ और पानी ने बाढ़ का रूप अख्तियार कर लिया। बाढ़ रूपी पानी का बहाव दौसा दरवाजे पर हुआ। बाढ़ रूपी पानी ने दौसा दरवाजे को खूब गिराने की कोशिश की, लेकिन दौसा दरवाजे ने बाढ़ रूपी पानी की सारी कोशिशें नाकाम कर दीं।
     बाढ़ रूपी पानी से दौसा दरवाजा करीब एक घंटे तक टक्कर लेता रहा, लेकिन हार नहीं मानी। हालांकि, इस टक्कर में वह जीर्ण-शीर्ण हो गया। दौसा दरवाजे के बाहर स्थित कन्या पाठशाला और छीपों की कोठी बाढ़ में बह गए थे, बाढ़ ने उनकी कोई निशानी वहां नहीं रहने दी। लेकिन, दौसा दरवाजे ने बाढ़ के पानी को सांगानेर में नहीं घुसने दिया। आखिर में बाढ़ रूपी पानी को ही पानी-पानी होना पड़ा और हार मानते हुए वह बाढ़ का पानी चाकसू की तरफ ढूंढ़ नदी में चला गया।
       उस समय सांगानेर की आबादी करीब 60000 थी। दौसा गेट यदि नहीं होता तो वह भयंकर बाढ़ सांगानेर को भी लील जाती। शायद जो सांगानेर वर्तमान में दुनियाभर में प्रसिद्ध है, वह नक्शे में ही नहीं होता। वर्तमान में सांगा सेतु पुलिया जहां बनी हुई है, वहीं पर दौसा गेट हुआ करता था। इस तरह दौसा गेट ने अपनी शहादत देकर सांगानेर के नाम को जीवित रखा।


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