देश की आयरन लेडी इंदिरा गांधी


जस्ट टुडे
नई दिल्ली। विश्व की आयरन लेडी इंदिरा ने अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता से बीसवीं सदी के  महान राजनीतिज्ञों को अपना नाम सदा के लिए स्वर्ण अक्षरों से अंकित कर दिया। भूतपूर्व राजाओं के प्रिवीपर्स खत्म करने, बैंकों के राष्ट्रीयकरण, हरित क्रांति, सफेद क्रांति,  भूमि सुधार, सिक्किम का  भारत  में  विलीनीकरण,  पाकिस्तान का विघटन और शिमला समझौते जैसे कदमों से इंदिरा ने अकल्पनीय  दृढ़ता दिखाई थी। इंदिरा  थीं तो  नेहरू की बेटी, लेकिन उन्होंने अपने अंदर लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के गुण भी आत्मसात् किए थे। जरा सोचिए कि इंदिरा की जगह अगर कोई अन्य प्रधानमंत्री होता तो क्या बांग्लादेश बन सकता था?  1971 के युद्ध में पाकिस्तान के टुकड़े करने के बाद उनके घोर विरोधी भी उन्हें साक्षात् दुर्गा कहने लगे। 1974में इंदिरा ने भारत का पहला परमाणु परीक्षण किया। भारत को छठा परमाणु शक्ति वाला देश बना दिया और संसार की आयरन लेडी बन गईं।



इंग्लैण्ड की प्रधानमंत्री  मार्गरेट थैचर  ने कहा कि मैंने उनमें एक स्टेट्समैन की खूबियां देखी थीं। वह अपने मुल्क को लेकर बेहद जुनूनी थीं, हमेशा उत्साहित रहती थीं और बहुत यथार्थवादी थीं। जब 1975 में इलाहबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा का निर्वाचन अवैध ठहरा दिया। विपक्ष ने उनके खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन किए, इंदिरा ने आंतरिक आपातकाल लगा दिया और सैकड़ों विपक्ष के नेता जेल में डाल दिए गये, तो जन आक्रोश से उन्हें 1977 में पराजय का मुहं देखना पड़ा। संघर्षशील इंदिरा ने आपातकाल के लिए जनता से खुले दिल से माफी मांगी और 1980 में पुन: प्रधानमंत्री बनी। 1980 में उनके ही कार्यकाल में भारत ने पहली बार अन्तरिक्ष युग में प्रवेश किया। 1984 में खुफिया एजेंसियों ने आशंका प्रकट की थी कि इंदिरा गांधी पर हमला हो सकता है,  इसलिए उनके सभी सिख गाड्र्स को हटाया जाए। लेकिन जब ये फाइल इंदिरा के पास पहुंची तो उन्होंने उस पर लिखा और आदेश दिया कि कोई भी सिख उनके सुरक्षा गाड्र्स से नहीं हटाए जाएं। इंदिरा गांधी लगातार तीन बार यानी 1966 से 1977 और फिर चौथी बार 1980 से  मृत्यु पर्यन्त 31 अक्टूबर  84 तक  भारत की प्रधानमंत्री  रहीं। लोगों ने सही ही कहा था कि आसमान में जब तक सूरज चाँद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा?


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर ने दिया प्रियदर्शिनी नाम


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर ने इंदिरा को एक नया नाम प्रियदर्शिनी दिया था, बापू भी उन्हें इसी नाम से पुकारते थे। इंदिरा की सक्रियता 5 साल की उम्र में ही प्रारम्भ हो गई थी, जब उन्होंने स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित होकर इंग्लैंड से मंगाई गई अपनी सबसे पसंदीदा एवं महंगी गुडिय़ा जला दी थी। उन्होंने 25 वर्ष की आयु में परिवार की इच्छा के विरूद्ध निडर बनते हुए फिरोज गांधी से शादी कर ली। इंदिरा के पिता नेहरू का अधिकांश समय जेल और स्वाधीनता के आंदोलनों में ही बीतता था। अपने परिवार के संस्कारों से प्रभावित होकर बचपन में ही इंदिरा ने क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों की सहायता करने के उद्देश्य से अपने हम उम्र बच्चों और मित्रों के सहयोग से 12 साल के उम्र में ही 'वानर सेनाÓ का गठन किया। वानर सेना स्वतंत्रता आंदोलन के लिए झंडे बनाने का काम करती थी। भारत छोड़ो आन्दोलन के समय सितम्बर 1942 में 22 वर्षीय इन्दिरा को गिरफ्तार कर लिया गया। 1965 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध के समय इन्दिरा सैन्य अधिकारियों की चेतावनी के बावजूद घायलों की देखभाल करने एवं सैनिकों के उत्साहवर्धन को युद्ध क्षेत्र में पहुंच गईं। अपने राजनीतिक कार्यकाल में उन्होंने कई बड़े फैसले किए। इंदिरा ने देश के महत्वपूर्ण 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया ताकि बैंक सरकार की आर्थिक नीति के अनुसार आचरण कर सकें, राष्ट्रीयकरण के बाद सामाजिक प्रगति के काम प्रारम्भ होने लगे।


गरीबी हटाओ का नारा लोकप्रिय हुआ


मध्यम वर्ग तथा अल्प मध्यम वर्ग के लोगों को रोजगार परक ऋण मिलने का मार्ग साफ हो गया। इंदिरा गांधी ने अगस्त 1970 में भूतपूर्व राजा-महाराजाओं को जो बड़ी राशि प्रीविपर्स के रूप में मिलती आ रही थी, उसकी समाप्ति की घोषणा कर दी। इंदिरा ने भूमि हदबंदी योजना को पूरी शक्ति के साथ लागू किया। इससे गरीब किसानों को अच्छा लाभ मिला। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओं के नारे के साथ समाजवादी सिद्धांतों के अनुरूप चुनावी घोषणा पत्र तैयार कराया गरीबी हटाओ का नारा लोकप्रिय साबित हुआ। उनके पूर्ववर्ती लोकहित कार्यों की पृष्ठभूमि ने भी चमत्कारी भूमिका निभाई। इन कदमों के कारण जनता के मध्य इंदिरा गांधी की एक सुधारवादी  प्रधानमंत्री  की छवि कायम हुई और उनकी लोकप्रियता का ग्राफ शिखर पर पहुंच गया। युद्ध हो या विपक्ष की नीतियां हों अथवा कूटनीति का अंतर्राष्ट्रीय मैदान हो इंदिरा गांधी ने स्वयं को सफल साबित किया था। 1971 के नवम्बर माह तक पूर्वी  पाकिस्तान के एक करोड़ शरणार्थी भारत में प्रविष्ट हो चुके थे। इन शरणार्थियों की उदर पूर्ति करना तब भारत के लिए एक समस्या बन गई थी। ऐसी स्थिति में भारत ने पाकिस्तान की पूर्वी पाकिस्तान के अन्दर बर्बरता के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवता के हित में आवाज बुलंद की, इसे पाकिस्तान ने अपने देश का आंतरिक मामला बताते हुए पूर्वी पाकिस्तान में घिनौनी सैनिक कार्रवाई जारी  रखी। छह माह तक वहां पाकिस्तान का दमन चक्र चला। पाकिस्तान ने 3 दिसम्बर, 1971 को भारत के वायु सेना के ठिकानों पर हमला करते हुए उसे युद्ध का न्योता दे दिया। पश्चिमी भारत के सैनिक अड्डों पर किया गया हमला पाकिस्तान की ऐतिहासिक पराजय का कारण बना। इंदिरा ने चतुरतापूर्वक तीनों सेनाध्यक्षों के साथ मिलकर यह योजना बनाई कि उन्हें दो तरफ  से आक्रमण करना है। एक आक्रमण पश्चिमी पाकिस्तान पर होगा और दूसरा आक्रमण तब किया जाएगा जब पूर्वी पाकिस्तान की मुक्तिवाहिनी सेनाओं को भी साथ मिला लिया जाएगा। जनरल जेएस अरोड़ा के नेतृत्व में भारतीय थल सेना मुक्तिवाहिनी की मदद के लिए मात्र ग्यारह दिनों में ढाका तक पहुंच गई। पाकिस्तान की छावनी को चारों ओर से घेर लिया गया। तब पाकिस्तान को लगा कि उसका मित्र अमरीका उसकी मदद करेगा। 


 


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