बुखारा से सांगानेर तक...कागजी का सफर



(अब्दुल रशीद, कागजी परिवार की पीढ़ी के सदस्य)


जस्ट टुडे
सांगानेर। अलवर जिला स्थित तिजारा दरबार ने बुखारा (ईरान और चीन बॉर्डर के पास) से करीब १३५७ वर्ष में दो कागजी परिवारों को खरीदा। इसमें करीब २० लोग शामिल थे। कुछ समय बाद तिजारा रियासत डांवाडोल हो गई। फिर जयपुर के महाराजा मानसिंह प्रथम उन्हें खरीदकर ले आए। महाराजा ने उन परिवार के सभी सदस्यों को आमेर में बसा दिया। फिर आमेर से ब्रह्मपुरी के कागदी बाड़ा में जगह दी। उसके बाद सांगानेर में लाकर बसाया।


क्योंकि, यहां मायली नदी, सरस्वती नदी और रावल नदी के जरिए पानी की कोई कमी नहीं थी। वे परिवार चावल की बस्सी, सण, मंूगफली के छिलके और बांस के उपयोग से कागज का निर्माण करते थे। इस तरह ये व्यवसाय समय के साथ आगे बढ़ता रहा। कागज की डिमांड बढऩे लगी तो कुछ कारीगरों को कोटा दरबार खरीदकर ले गए। कोटा, सवाईमाधोपुर, चित्तौड़ के धोसुंडा सहित उदयपुर के राजा भी उनका बनाया कागज मंगाने लगे। उस समय कागज से स्टाम्प पेपर, पाई पेपर बनाया जाता था, जिसकी आपूर्ति रियासत में की जाती थी। व्यवसाय आगे बढ़ा तो स्थानीय बाजार में भी बही-खाते बनाकर बेचने लगे। अभी सांगानेर में करीब 400 परिवार हैं और अभी भी कागज का निर्माण कर रहे हैं। 


गेहूं का रस बनाता था चिकना


इस कागज की खासियत यह थी कि इसमें कैमिकल इस्तेमाल नहीं किया जाता था। कागज में चिकनाई और कड़कपन के लिए गेहूं का रस मिलाते थे। दीवारों पर सुखाते थे। करीब 17 बाई 27 और 22 बाई 30 सेमी. का कागज उस समय बनता था। फिर उसमें से चौथाई हिस्सा करके पाई पेपर और स्टाम्प पेपर बनाते थे। उस समय कागज बनाने की पूरी प्रक्रिया हाथों से ही होती थी। अब तो कई मशीनें भी आ गई हैं। फिर भी कई लोग आज भी हाथों से ही कागज बना रहे हैं।

अंग्रेजों को भी पसंद था शुद्ध देसी कागज

अंग्रेजों के जमाने में ईस्ट इंडिया कम्पनी वाले मिल मेड कागज ब्रिटेन से मंगाते थे। इसकी आपूर्ति झांसी, ग्वालियर और इंदौर सहित कई जगह किया जाता था। अंग्रेज हमारे शुद्ध हैण्डमेड पेपर को लेकर ब्रिटेन भेज देते थे, उसका इस्तेमाल वहां किया जाता था। देश आजाद होने के बाद कॉपरेटिव सोसायटी के जरिए बॉम्बे खादी बोर्ड और राज्य के खादी ग्रामोद्योग को सप्लाई देने लगे।

दिल्ली से लेकर जापानी तक हैं दीवाने

अभी इस हैण्डमेड कागज से शादी कार्ड, इन्वेटीशन कार्ड, शॉपिंग बैग, लैम्प और विजिटिंग कार्ड बहुत समय से लोगों की पसंद रहे हैं। वर्ष 1968 में पेपर कोन और रेडियो के अंदर लगने वाला काला पर्दा भी सांगानेर में खूब बन रहा है। कई नामी-गिरामी कम्पनियां सीधे इस कागज को खरीद रही हैं। सांगानेर के हैण्डमेड पेपर से बनी वस्तुओं की मांग दिल्ली, मुम्बई, महाराष्ट्र, गुजरात सहित अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और जापान तक है। 


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